Ganesh ji stuti in hindi | Ganpati Atharvashirsha in Hindi | गणपत्यथर्वशीर्षम् हिन्दी ।

Ganesh ji stuti in hindi-Ganpati Atharvashirsha in Hindi.


गणपत्यथर्वशीर्षम् हिन्दी।


अथर्वशीर्षकी परम्परा में गणपत्यथवशीर्ष का विशेष महत्व है। प्रायः प्रत्येक मांगलिक कार्यमें गणपति पूजनके अनन्तर प्रार्थनारूपमें इसके पाठकी परम्परा है। यह भगवान गणपति का वैदिक स्तवन है। गणपति महामन्त्र ऊ गं गणपतये नमः एवं गणेश गायत्री मन्त्र का भी इसके अन्तर्गत माहात्म्यसहित समावेश है। इसका पाठ करनेवाला किसी भी प्रकार के विघ्नसे बाधित न होता हुआ महापातकों से मुक्त हो जाता है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरूषार्थो को प्राप्त करता है।

Ganesh ji stuti in hindi-Ganpati Atharvashirsha in Hindi.
Ganesh ji stuti in hindi-Ganpati Atharvashirsha in Hindi.

विशेष - लाखों भक्तो की विशेष प्रार्थना थी कि गणपति अथर्वशीर्ष संस्कृत भाषा में होने के कारण हम गणेशजी का वैदिक स्तुति कर कर पाते है। इसलिये गणेश जी के प्रिय भक्तो के लिय े हिन्दी में गणपति अथर्वशीर्ष का पूर्ण पाठ प्रस्तुत किया है।

गणपत्यथर्वशीर्षम् हिन्दी।



गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्व हो,तुम्हीं केवल कर्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरूप ब्रह्म  हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो।।1।।


यथार्थ कहता हूॅ। सत्य कहता हूॅ।। 2।।

तुम मेरी रक्षा करो। वक्ताकी रक्षा करो। श्रोताकी रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाताकी रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्यकी रक्षा करो। शिष्यकी रक्षा करो। पीछे से रक्षा करो। आगे से रक्षा करो। उत्तर भाग की रक्षा करो। दक्षिण भाग की रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे की ओर से रक्षा करो। सर्वतोभावसे मेरी रक्षा करो, सब दिशाओं से मेरी रक्षा करो।।3।।




तुम वाड्मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो, तुम ब्रहा्रमय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म   हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो।।4।।

यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि,जल,अग्नि,वायु और आकाश हो। तुम्हीं परा,पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो।।5।।




तुम सत्व-रज-तम इन तीनों गुणों से परे हो। तुम भूत-भविष्य-वर्तमान इन तीनों कालों से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों देहों से परे हो। तुम नित्य मूलाधार चक्र में स्थित हो। तुम प्रभु, शक्ति,उत्साह-शाक्ति और मन्त्र-शक्ति इन तीनों शक्तियों से संयुक्त हो। योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रहा्रा हो, तुम विष्णु हो, तुम रूद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चद्र्रमा हो, तुम सगुण ब्रहा्र हो, तुम निर्गुण त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो।।6।।



‘गण‘ शब्द के आदि अक्षर गकारका पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकारका उच्चारण करे। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्रसे पहले शोभित जो ‘गं‘ हैं, वह ओंकारके द्वारा रूद्व हो अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्रका स्वरूप ऊ गं ऊ है। ‘गकार‘ पूर्वरूप है, ‘अकार‘ मध्यरूप है, ‘अनुस्वार‘ अन्त्यरूप है। ‘बिन्दु‘ उत्तररूप है। ‘नाद‘ संधान है। ‘संहिता‘ सन्धि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्या के गणक ऋषि हैं, निचृद् गायत्री छनद है और गणपति देवता हैं। मन्त्र - ऊ गं गणपतये नमः । ।।7।।




एकदन्तको हम जानते हैं, वक्रतुण्डका हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको ज्ञान और ध्यानमें प्रेरित करें।।8।।




गणपतिदेव एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। वे अपने चार हाथोंमें पाश,अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषकका चिन्ह है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पोंद्वारा सुपूजित हैं। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले, ज्योतिर्मय, जगत्के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरूष से परे विद्यमान वे पुरूषोत्तम सृष्टिके आदि में आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता हैं, वह योगी योगियों में श्रेष्ठ हैं। ।।9।।




व्रातपतिको नमस्कार, गणपतिको नमस्कार,प्रमथपति को नमस्कार, लम्बोदर, एकदन्त,विघ्ननाशक,शिवतनय श्रीवरदमूर्तिको नमस्कार हैं। ।।10।।




इस अथर्वशीर्षका जो पाठ करता हैं, वह ब्रहा्रीभूत होता हैं, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता हैं, वह पंच महापापोंसे मुक्त हो जाता है। सांयकाल इसका पाठ करनेवाला दिनमें किये हुए पापोंका नाश करता हैं, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रिमें किये हुए पापों का नाश करता है। सांय और प्रातःकाल पाठ करनेवाला निष्पाप हो जाता है। सदा सर्वत्र पाठ करने वाला सभी विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ,काम तथा मोक्ष इन चारों पुरूषार्थाेंको प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष उसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्यको उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी एक हजार आवृति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्व कर लेगा ।।11।।




जो इस मन्त्रके द्वारा श्रीगणपतिका अभिषेक करता हैं? वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथिमें उपवासकर जप करता हैं, वह विद्यावान् हो जाता हैं। यह अथर्वण वाक्य है। जो ब्रहा्रादि आवरणको जानता हैं, वह कभी भयभीत नहीं होता है ।।12।।

जो दूर्वांकुरोंद्वारा यजन करता हैं, वह कुबेरके समान हो जाता है। जो लाजाके द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान् होता है। जो सहस्त्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधाके द्वारा हवन करता हैं, वह सब कुछ प्राप्त करता है।।13।।

जो आठ ब्रामण  को इस उपनिषद्का सम्यक् ग्रहण करा देता हैं, वह सूर्य के समान तेजः सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमाके निकट इस उपनिषद्का जप करके साधक सिद्वमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। महापापोंसे मुक्त हो जाता है। महादोषोंसे मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है- जो इस प्रकार जानता है ।। 14।।

इस प्रकार यह  ब्रह्म  विधा  है।

ऊ शान्तिः ऊ शन्तिः ऊ शान्तिः।




विशेष नोट - गणपति अथर्वशीर्ष पाठ को लिखते समय पूर्ण सावधानी बरती गई मगर किसी तकनीकी कमी कंप्यूटर की गलती या मानवीय भूल जैसे मात्राओ की गलती होना संभव हो सकता है | 
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