SOMVAR VRAT VIDHI KATHA AARTI HINDI.| सोमवार व्रत विधि कथा आरती हिंदी | somvar vrat food in hindi|

SOMVAR VRAT VIDHI KATHA AARTI HINDI.

सोमवार व्रत विधि कथा आरती हिंदी | 

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SOMVAR VRAT VIDHI KATHA AARTI HINDI.

SOMVAR VRAT VIDHI KATHA AARTI HINDI.



somvar vrat vidhi in hindi.
सोमवार व्रत पूजन विधि हिंदी में |  

ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-

  • यह व्रत चैत्र ,वैशाख, श्रावण और कार्तिक मार्गशीर्ष के मास से धारण करने योग्य होता है। फिर भी किसी भी शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से व्रत का प्रारंम्भ किया जा सकता है। 

somvar vrat food in hindi. सोमवार के व्रत में क्या भोजन लें।

ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-



  • सोमवार के व्रत में भोेजन में दही,दूध,चावल अथवा खीर के प्रथम सात ग्रास स्वंय खायें फिर अन्य भोजन सामग्री का सेवन करें। 
  • भोजन से पहले किसी विद्यार्थी को इन वस्तुओं का दान करेें। तथा भोजन सूर्यास्त बाद करना समुचित है। सोमवार के दिन सफेद रंग के कपडो को धारण करना अच्छा होता है।
  •  प्रात-काल स्नान करके नये सफेद रंग के कपडे पहने फिर शिव मंन्दिर में जाकर शिवजी का गंगाजल,दूध,दही,शहद,घी आादि से अभिषेक करें तथा धूप,दीप दिखावे और यथा संभव ओम नमः शिवाय मंत्र  का जाप करें। 
  • और यथा संभव सफेद वस्तुओं का दान करें। सोमवार का व्रत साधारणतया दिन के तीसरे पहर तक होता है। व्रत में फलाहार या पारण का कोई खास नियम नही है किन्तु यह आवश्यक है कि दिन रात में केवल एक समय भोजन करेें। 
  • सोमवार के व्रत में शिवजी और माॅं पार्वतीजी का पूजन करना चाहिए। सोमवार के व्रत तीन प्रकार से किये जाते है।
  •  साधारण सोमवार,सौम्य प्रदोष और सोलह सोमवार विधि तीनों की एक जैसी है।
  •  शिव पूजन के पश्चात कथा सुननी चाहिए। प्रदोष व्रत ,सोलह सोमवार कथा तीनों की कथा अलग-अलग है जो आगे लिखी गई है। 
                हर हर महादेव -हर हर महादेव -हर हर महादेव -हर हर महादेव -हर हर महादेव -हर हर महादेव | 
ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-





SOMVAR VRAT KATHA IN HINDI.
।। अथ सोमवार व्रत की कथा।।
ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय
  • एक बहुत  धनवान साहुकार था,
  •  जिसके घर धन आदि किसी प्रकार की कमी नहीं थी। परन्तु उसको एक दुःख था। 
  • उसके पास कोई पुत्र नहीं था। वह इसी चिन्ता में रात दिन रहता था और वह पुत्र की कामना के लिए प्रति सोमवार को शिवजी का व्रत और पूजन किया करता था।
  •  सांयकाल को शिव मन्दिर में जा करके शिवजी पर दीपक जलाया करता था।
  •  उसके भक्ति भाव को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शिवजी महाराज से कहा कि महाराज यह साहुकार आपका अत्यंत भक्त है और सदैव आपका व्रत और पूजन बडी श्रद्वा से करता है इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए।
  •  शिवजी ने कहा कि पार्वती जी यह संसार कर्मक्षेत्र है जैसे किसान खेत में जैसा बीज बोता है वैसा ही फल काटता है उसी तरह इस संसार में जैसा करते है वैसा फल भोगते है।
  •  पार्वती जी ने अत्यंत आग्रह से कहा कि महाराज जब यह आपका ऐसा भक्त है और यदि इसको किसी प्रकार का कोई दुःख है तो उसको अवश्य दूर करना चाहिए।
  •  क्योकि आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु हैं। उनके दुःखो को दूर करते है। 
  • यदि आप ऐसा न करेंगे तो मनुष्य क्या आपकी सेवा व्रत करेंगे। 
  • पार्वती जी का ऐसा आग्रह देख शिवजी महाराज कहने लगे हे पार्वती ! इसके कोई पुत्र नहीं है इसी चिन्ता से यह अति दुःखी रहता है। 
  • इसके भाग्य में पुत्र न होने पर भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हॅू, परन्तु यह पुत्र केवल 12 वर्ष तक जीवित रहेगा। 
  • इसके पश्चात् यह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इससे अधिक और मैं कुछ इसके लिए नहीं कर सकता । यह सब बातें वह साहूकार सुन रहा था।
  •  इससे उसको न कुछ प्रसन्नता हुई और न ही कुछ कष्ट हुआ। वह पहले जैसे ही शिवजी महाराज का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीनंे उसके गर्भ से अति सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुई। 
  • साहूकार के घर में बहुत खुशी मनाई गई। परन्तु साहूकार ने उसकी केवल बारह वर्ष की आयु जान कोई अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं की और नहीं किसी को भेद बतलाया। जब वह 11 वर्ष का हो गया तो उस बालक की माता ने उसके पिता से विवाह आदि के लिए कहा परन्तु वह साहूकार कहने लगा मैं अभी इसका विवाह नहीं करूंगा। और काशी जी पढने के लिए भेजूगां।
  •  फिर साहूकार ने अपने सालेे अर्थात उस बालक के मामा को बुला उसको बहुत सा धन देकर कहा तुम इस बालक को काशी जी पढने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस स्थान भी जाओ यज्ञ करते और ब्राहा्रणों को भोजन करते जाओ।
  •  वह दोनों मामा और भानजें सब जगह सब प्रकार यज्ञ करते और ब्राहा्रणों को भोजन कराते जा रहे थे। रास्ते में उनको एक शहर पडा। 
  • उस शहर के राजा की कन्या का विवाह था और दूसरे राजा का लडका जो विवाह कराने के लिए बारात लेकर आया था वह एक आंख से काना था।
  •  उसके पिता को इस बात की बडी चिंता थी कि कहीं वर को देख कन्या के माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अडचन पैदा न कर दें।
  •  इस कारण जब उसने अति सुन्दर सेठ के लडके को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों न ढुकाव इस लडके से करा दिया जाय,।
  •  घोडी पर चढा ढुकाव पर ले गये और बडी सुन्दरता से सब कार्य हो गए। वर के पिता ने सोचा यदि विवाह कार्य भी इसी लडके से करा दिया जाय तो क्या बुराई है? ऐसा विचार कर लडके और उसके मामा से कहा यदि आप फेरों और कन्यादान के काम भी करादें तो आपकी बडी कृपा होगी और हम इसके बदले में बहुत कुछ धन दे देंगे।
  •  उन्होनें भी स्वीकार कर लिया । और विवाह कार्य बहुत अच्छी तरह से हो गया। परन्तु जिस समय लडका जाने लगा तो उसने राज कुमारी की चन्दडी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है परन्तु जिस राजकुमार के साथ तुमको भेजेगें वह एक आंख से काना है मैं तो काशी जी पढने जा रहा हूॅं। तब राजकुमारी ने जब चुन्दडी पर ऐसा लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और कहा कि वह मेरा पति नहीं है।
  •  मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ। वह तो काशी जी पढने गया है। राजकुमारी के माताा पिता ने अपनी कन्या को बिदा नही किया और बारात वापिस चली गई।
  •  उध रवह सेठ का लडका और उसका मामा काशी जी पहुॅच गए। वहाॅं जाकर उन्होंनें यज्ञ करना और लडके ने पढना शुरू कर दिया। 
  • जब लडके की आयु बारह साल की हो गई। तब एक दिन उन्होनें यज्ञ रचा रखा था कि लडके ने अपने मामा जी से कहा मामा जी आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। 
  • मामा ने कहा अन्दर जाकर सो जाओ। लडका अन्दर जाकर सो गया और थोडी देर में उसके प्राण निकल गए। जब उसके मामा न आकर देखा कि वह तो मुर्दा पडा है तो उसको बडा दुःख हुआ और उसने सोचा कि मैं अभी रोना पीटना मचा दूंगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा।
  •  अतः उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य समाप्त कर ब्राहा्रणों के जाने के बाद रोना पीटना आरम्भ कर दिया संयोग वश उसी समय शिवजी महाराज व पार्वती जी उधर से जा रहे थे।
  •  तब उन्होंने जोर जोर से रोने पीटने की आवाज सुनी तो पार्वती ने कहा महाराज यह तो उसी साहूकार का लडका है तो शिवजी बोले-पार्वती जी इसकी आयु इतनी ही थीं,सो भोग चुका । 
  • पार्वती जी ने कहा कि महाराज कृपा करके इस बालक को और आयु दो नही  तो इसके माता पिता तडप तडप कर मर जायेगें। पार्वती जी के इस प्रकार बार बार आग्रह करने पर शिवजी ने उसको जीवन वरदान दिया।
  •  और शिवजी महाराज की कृपा से लडका जीवित हो गया। शिव पार्वती जी कैलाश चले गए। तब लडका मामा उसी प्रकार यज्ञ कराते हुए अपने घर की ओर चल पडे।
  •  रास्ते में उसी शहर में आये जहाॅं विवाह हुआ था। वहाॅं पर आकर उन्होनें यज्ञ आरम्भ कर दिया तो लडके के ससुर ने पहचान लिया और अपने घर महल में ले जाकर खातिर की । 
  • साथ ही बहुत दास दासियों के सहित आदर पूर्वक लडकी और जमाई की बिदा किया।
  •  जब वह अपने शहर के निकट आए तो मामा ने कहा कि मैं पहले तुम्हारे घर जाकर सबकी खबर कर आता हॅू। उस लडके के माता पिता अपने घर की छत पर बैठे हुए थे और उन्होंने यह प्रण कर रखा था।
  •  कि यदि हमारा पुत्र सकुशल घर पर आये तो राजी खुशी नीचे उतर कर आ जायेंगे नही तो छत से गिरकर अपने प्राण खो देंगे।
  •  इतने में उस लडके के मामा ने जाकर यह समाचार दिया कि आपका पुत्र आ गया है परन्तु उनको विश्वास नहीं आया तब उसके मामा ने विस्तार पूर्वक बताया।
  •  आपका पुत्र अपनी स्त्री के साथ बहुत सारा धन साथ में लेकर आया हुआ है। 
  • तब उनका स्वागत किया और बडी प्रसन्नता के साथ रहने लगे।
  •  इसकी प्रकार सोमवार के व्रत को जो धरण करता है अथवा इस कथा को पढता सा सुनता है उसकी समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है। 
ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-

SOMVAR VRAT AARTI HINDI.
।। सोमवार की व्रत आरती।।


शिवजी की आरती।

जय शिव ओंकारा हरशिव ओंकारा।

ब्राम्भा  विष्णु सदाशिव अद्र्वांगी धारा।। टेक।।

एकानन चतुरानन पच्चानन राजे।

हंसानन गरूडासन वृषवाहन साजे।। जय।।

दो भुज चार चतुर्भुज दशभुज अति सोहे।

तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे।। जय।।

जयमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुुरारी कंसारी वर माला धारी।। जय।।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक ब्रहा्रादिक भूतादिक संगे।। जय।।
कर में श्रेष्ठ कमण्ठल चक्र त्रिशूल धरता ।
जगकरता जगहरता जग पालन करता।। जय।।
ब्राम्भा ,विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका।। जय।।
त्रिगुण आरती शिव की जो कोई गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पत्ति पावे।। जय।।
ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय-ऊ नमः शिवाय.


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